उत्तर प्रदेश का पट्टी क्षेत्र आज भी विकास की बुनियादी परिभाषाओं से कोसों दूर खड़ा है। वर्षों से यह क्षेत्र राजनीतिक दलों के लिए केवल एक चुनावी अखाड़ा बना रहा, जहां भाषणों में पुल बनते रहे, लेकिन ज़मीन पर सिर्फ़ गड्ढे दिखाई दिए।
चाहे सड़क हो, स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो या रोज़गार—हर क्षेत्र में पट्टी पिछड़ा हुआ है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत ऐसी है कि डॉक्टर से ज़्यादा कंपाउंडर मिलते हैं, स्कूलों में भवन तो हैं लेकिन शिक्षक नहीं। ग्रामीण सड़कों की हालत यह है कि बारिश में गड्ढा ढूंढना नहीं पड़ता, पूरा रास्ता ही गड्ढा बन जाता है।
राजनीतिक दल हर चुनाव में “विकास का वादा” दोहराते हैं, लेकिन परिणामस्वरूप जनता को बस ठगा हुआ महसूस होता है। पंचायत से लेकर विधानसभा तक, भ्रष्टाचार और उदासीनता की श्रृंखला ने जनता का भरोसा तोड़ा है।
इस बार का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन हारा, बल्कि यह होना चाहिए कि "पट्टी कब जीतेगा?"
कब यहाँ के युवाओं को बाहर शहरों में रोज़गार की तलाश में पलायन नहीं करना पड़ेगा? कब यहाँ के किसानों को अपनी फसल का वाजिब दाम मिलेगा? और कब इस क्षेत्र को भी विकास की मुख्यधारा में लाया जाएगा?
अब वक्त आ गया है कि जनता केवल नारों पर नहीं, कार्यों पर वोट दे। यदि नेताओं ने अब भी पट्टी को गंभीरता से नहीं लिया, तो जनता उन्हें राजनीतिक पट्टी बांधने में देर नहीं करेगी।
---
🔚 निष्कर्ष:
> पट्टी के विकास की कहानी अब सिर्फ़ योजनाओं की फाइलों में नहीं, ज़मीन पर दिखनी चाहिए।
वर्ना यह क्षेत्र सिर्फ़ राजनीतिक भाषणों की शोभा बना रहेगा।
No comments:
Post a Comment