उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति और धर्म का प्रभाव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 ने इसे एक बार फिर सबसे बड़े निर्णायक कारकों में साबित कर दिया। इस चुनाव में मतदाताओं की पसंद न केवल विकास के मुद्दों से बल्कि उनकी सामाजिक पहचान और सामूहिक अस्मिता से भी तय हुई।
इस बार भाजपा को चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन ने विपक्ष को एक नया रूप दिया। इस गठबंधन को विशेष रूप से मुस्लिम, यादव, और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों (जैसे मौर्य, शाक्य) से अपेक्षित समर्थन मिला। वहीं, भाजपा ने अपने मजबूत सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी, और दलित मतदाता आधार को बनाए रखा, जिससे मुकाबला कांटे का रहा।
🔹 मुस्लिम मतदाता: रणनीतिक गोलबंदी
मुस्लिम समुदाय ने इस बार लगभग एकजुट होकर INDIA गठबंधन (सपा-कांग्रेस) को वोट किया। विशेषकर उन सीटों पर जहाँ भाजपा को हराने की संभावना दिखी, वहाँ रणनीतिक रूप से वोट ट्रांसफर हुए। यह एक स्पष्ट संदेश था कि अल्पसंख्यक समुदाय अब तुष्टिकरण नहीं, बल्कि सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग पर मतदान करता है।
🔹 यादव मतदाता: परंपरागत निष्ठा का निर्वाह
यादव समाज समाजवादी पार्टी की रीढ़ रहा है, और 2024 में भी यह निष्ठा कायम रही। हालांकि भाजपा ने मोदी ओबीसी ब्रांडिंग के ज़रिए यादवों के कुछ वर्गों में सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन कुल मिलाकर सपा का जनाधार बना रहा।
🔹 मौर्य और अन्य पिछड़ी जातियाँ: असमंजस और बिखराव
मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, पाल जैसे वर्गों का वोट विभाजित रहा। भाजपा ने इन समुदायों को “सशक्त प्रतिनिधित्व” और “सामाजिक सम्मान” के नारे के साथ अपने साथ जोड़े रखा, वहीं सपा ने स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं को आगे कर समर्थन जुटाने का प्रयास किया। नतीजतन, इस वर्ग का मतदाता एकतरफा किसी भी ओर नहीं गया।
🔹 दलित वोटर: बसपा की चुप्पी, वोटर की चुप्पी
मायावती की बहुजन समाज पार्टी इस चुनाव में लगभग निष्क्रिय रही। इसका लाभ भाजपा और सपा-कांग्रेस दोनों ने उठाया। जहां जाटव समुदाय अब भी बसपा के प्रति निष्ठावान दिखा, वहीं अन्य दलित वर्गों (जैसे पासी, वाल्मीकि) ने भाजपा की सामाजिक योजनाओं और हिंदुत्व आधारित सुरक्षा के संदेश को अपनाया।
🔹 धर्मनिरपेक्षता बनाम ध्रुवीकरण
उत्तर प्रदेश में धर्मनिरपेक्षता अब केवल सिद्धांत नहीं, रणनीति बन गई है। एक ओर विपक्ष अल्पसंख्यकों और पिछड़ों को एकजुट कर "संविधान बचाओ" का संदेश देता है, वहीं भाजपा "राष्ट्रवाद", "सांस्कृतिक गौरव", और "सबका साथ" की ब्रांडिंग के जरिए जनमानस को जोड़ती है। इस संघर्ष में धर्म और जाति दोनों पक्षों की रणनीति का केंद्रीय बिंदु बन गए हैं।
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🔚 निष्कर्ष:
> लोकसभा चुनाव 2024 ने साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में मतदाता अब जाति और धर्म के बीच एक नई राजनीतिक समझदारी के साथ वोट डालता है।
वोटर अब जागरूक है, लेकिन उसकी प्राथमिकताएँ अब भी सामाजिक पहचान से गहराई से जुड़ी हैं।
सवाल यह है कि क्या अगली बार यह पहचान विकास में तब्दील होगी?
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