Wednesday, July 16, 2025

बार-बार वकीलों की हड़ताल: कानून के रक्षक या न्याय में बाधा?



लेखक: आशीष कुमार जायसवाल ऐडवोकेट 

कहा जाता है कि  “न्याय में देरी से जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ जाता है।”

कोर्ट परिसर में चुप्पी पसरी हुई है। पेशी की तारीख़ पर पहुंचे सैकड़ों लोग मायूस लौटते हैं। वकील मौजूद नहीं हैं, क्योंकि वे हड़ताल पर हैं। यह दृश्य अब कोई असामान्य बात नहीं रही। आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से में वकील हड़ताल पर चले जाते हैं—कभी पुलिस से झड़प, कभी जज की टिप्पणी, तो कभी किसी सहकर्मी पर कार्रवाई।


लेकिन सवाल यह है कि जब न्याय के रक्षक ही न्याय प्रक्रिया को बाधित करें, तो आम जनता कहां जाए?



---


क्या कहते हैं आँकड़े?


नेशनल जुडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार देश भर में लाखों केस वर्षों से लंबित हैं। कोर्ट की देरी को लेकर अक्सर न्यायपालिका को दोष दिया जाता है, लेकिन वकीलों की हड़तालें भी एक बड़ी वजह हैं। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक जैसे राज्यों में तो साल भर में औसतन 20–30 दिन कोर्ट वर्क बाधित होता है।



---


वकीलों का पक्ष: आत्म-सम्मान का सवाल


वकीलों का मानना है कि वे कानून व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं, लेकिन उनका सम्मान और अधिकार अक्सर अनदेखा किया जाता है।


हाल ही में कई हड़तालें पुलिस द्वारा वकीलों के साथ बदसलूकी के खिलाफ की गईं।


कुछ मामलों में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा वकीलों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की गई — जिसे वकील ‘मानहानि’ मानते हैं।


बार एसोसिएशन बार-बार कहता है कि शांतिपूर्ण विरोध उनका संवैधानिक अधिकार है।




---


विरोध का अधिकार, लेकिन क्या सीमा भी होनी चाहिए?


सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि वकीलों की हड़तालें अवैध हैं।


2002 में Ex-Capt. Harish Uppal बनाम भारत सरकार केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था:


> "वकीलों को हड़ताल करने या अदालत का बहिष्कार करने का कोई अधिकार नहीं है। यह न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।"




बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी कई बार अपील की है कि वकील वैकल्पिक तरीकों से विरोध जताएं—जैसे काली पट्टी, मार्च, याचिका—but कोर्ट वर्क बाधित न करें।




---


किसे होता है सबसे ज़्यादा नुकसान?


इस प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान आम जनता को होता है:


जेल में बंद गरीब कैदियों को जमानत नहीं मिल पाती।


पीड़ित को वर्षों तक न्याय नहीं मिलता।


गवाह की उपस्थिति बर्बाद हो जाती है।


न्याय व्यवस्था की साख पर सवाल खड़े होते हैं।




---


समाधान क्या हो सकता है?


1. संवाद को प्राथमिकता मिले — वकीलों, न्यायाधीशों और शासन के बीच नियमित संवाद हो।



2. संस्थागत शिकायत तंत्र बने — जिससे वकीलों की समस्याएँ समय रहते सुलझ सकें।



3. अनुशासनात्मक नियंत्रण — अनावश्यक हड़तालों पर सख्ती से रोक लगे।



4. संपूर्ण न्यायिक सुधार — जिसमें वकीलों के कल्याण और सम्मान की भी बात हो।





---


निष्कर्ष:


कानून की डिग्री पहनकर न्याय का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील समाज के सबसे ज़िम्मेदार वर्गों में आते हैं। लेकिन अगर वे खुद न्याय की गति को रोकने लगें, तो यह संविधान की आत्मा पर प्रहार जैसा होगा।


अदालतें सिर्फ जजों से नहीं, वकीलों से भी चलती हैं। यदि वे ही मैदान छोड़ दें, तो न्यायपालिका एक अधूरी इमारत बन जाती है।

No comments:

Post a Comment