Wednesday, July 16, 2025

प्रतापगढ़: नाम में बसा इतिहास, गौरव और गाथाएं

 

उत्तर प्रदेश का प्रतापगढ़ ज़िला केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, अध्यात्म, और राजनीति की गहराइयों में रचा-बसा एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी जड़ें भारत की विविध परंपराओं से जुड़ी हुई हैं।


इस जिले के नाम की शुरुआत एक ऐतिहासिक शख्सियत से हुई — राजा प्रताप सिंह।

17वीं शताब्दी में उन्होंने रामपुर नामक स्थान को राजधानी बनाया और वहाँ एक किला बनवाया जिसे "प्रतापगढ़" कहा गया — अर्थात् "प्रताप का गढ़"।


> "जब सौ पढ़ा, तब एक प्रतापगढ़ा पढ़ा।"

– यह कहावत बताती है कि प्रतापगढ़ ज्ञान, प्रभाव और संस्कृति का केंद्र रहा है।




🌸 अध्यात्म में प्रतापगढ़: कृपालु महाराज की धरती


प्रतापगढ़ ही वह भूमि है जहाँ जन्मे जगद्गुरु कृपालु महाराज — जिन्हें आधुनिक युग का पंचम जगद्गुरु कहा जाता है।

उनकी शिक्षाओं ने भक्ति योग को नई ऊँचाई दी।

प्रेम मंदिर (वृंदावन) जैसे दिव्य स्थलों की स्थापना से लेकर 'प्रेम रस सिद्धांत' जैसी रचनाएँ आज भी लाखों भक्तों को मार्गदर्शन देती हैं।

उनका जन्म मगंरह गांव (प्रतापगढ़) में हुआ, और उनकी जीवनयात्रा प्रतापगढ़ को वैश्विक धार्मिक मानचित्र पर स्थापित कर गई।


🏹 राजनीति की धुरी: राजा भैया


प्रतापगढ़ की राजनीति में भी कई करिश्माई चेहरे उभरे हैं, जिनमें सबसे चर्चित नाम है – राजा भैया, अर्थात् रघुराज प्रताप सिंह।

कुंडा विधानसभा से 1993 से लगातार विधायक रहे राजा भैया ने न केवल एक जनाधारित राजनीति का निर्माण किया, बल्कि 2018 में अपनी अलग पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक भी बनाई।


उनकी छवि जहाँ एक तरफ बाहुबली, शक्तिशाली और बेबाक नेता की रही, वहीं दूसरी तरफ उन्हें जनता का प्रिय भी माना गया।

वे सत्ता में हों या विपक्ष में, प्रतापगढ़ की राजनीति की धुरी अक्सर उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही है।


❤️ इतिहास की सबसे अनोखी प्रेम कहानी: स्टालिन की बेटी और बृजेश सिंह


प्रतापगढ़ से जुड़ी एक और आश्चर्यजनक गाथा है – सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन की बेटी स्वेतलाना और कलंकांकर राजघराने के बृजेश सिंह की प्रेम कहानी।


जब बृजेश सिंह मॉस्को में इलाज के लिए गए, वहीं उनकी मुलाकात स्वेतलाना से हुई और दोनों में प्रेम हो गया।

हालाँकि सोवियत सरकार ने उनकी शादी की अनुमति नहीं दी, लेकिन बृजेश सिंह की मृत्यु के बाद स्वेतलाना उनकी अस्थियाँ लेकर प्रतापगढ़ आईं।

यह प्रेम कहानी केवल निजी नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं और दो संस्कृतियों के मिलन की कहानी भी है।



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🪔 निष्कर्ष


प्रतापगढ़ का नाम केवल एक भौगोलिक पहचान नहीं है – यह इतिहास का सम्मान, धर्म की चेतना, राजनीति की गूंज, और प्रेम की पराकाष्ठा का जीवंत दस्तावेज़ है।

चाहे वह कृपालु महाराज का अध्यात्म हो, राजा भैया की राजनीति, या स्टालिन की बेटी की प्रेम कहानी — यह जिला विविधताओं की भूमि है।


आज जब हम "प्रतापगढ़" का नाम लेते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि यह नाम एक साधारण नगर नहीं, बल्कि एक गौरवशाली परंपरा है — जो पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।

पट्टी: वादों में खोया विकास

 


उत्तर प्रदेश का पट्टी क्षेत्र आज भी विकास की बुनियादी परिभाषाओं से कोसों दूर खड़ा है। वर्षों से यह क्षेत्र राजनीतिक दलों के लिए केवल एक चुनावी अखाड़ा बना रहा, जहां भाषणों में पुल बनते रहे, लेकिन ज़मीन पर सिर्फ़ गड्ढे दिखाई दिए।


चाहे सड़क हो, स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो या रोज़गार—हर क्षेत्र में पट्टी पिछड़ा हुआ है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत ऐसी है कि डॉक्टर से ज़्यादा कंपाउंडर मिलते हैं, स्कूलों में भवन तो हैं लेकिन शिक्षक नहीं। ग्रामीण सड़कों की हालत यह है कि बारिश में गड्ढा ढूंढना नहीं पड़ता, पूरा रास्ता ही गड्ढा बन जाता है।


राजनीतिक दल हर चुनाव में “विकास का वादा” दोहराते हैं, लेकिन परिणामस्वरूप जनता को बस ठगा हुआ महसूस होता है। पंचायत से लेकर विधानसभा तक, भ्रष्टाचार और उदासीनता की श्रृंखला ने जनता का भरोसा तोड़ा है।


इस बार का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन हारा, बल्कि यह होना चाहिए कि "पट्टी कब जीतेगा?"

कब यहाँ के युवाओं को बाहर शहरों में रोज़गार की तलाश में पलायन नहीं करना पड़ेगा? कब यहाँ के किसानों को अपनी फसल का वाजिब दाम मिलेगा? और कब इस क्षेत्र को भी विकास की मुख्यधारा में लाया जाएगा?


अब वक्त आ गया है कि जनता केवल नारों पर नहीं, कार्यों पर वोट दे। यदि नेताओं ने अब भी पट्टी को गंभीरता से नहीं लिया, तो जनता उन्हें राजनीतिक पट्टी बांधने में देर नहीं करेगी।



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🔚 निष्कर्ष:


> पट्टी के विकास की कहानी अब सिर्फ़ योजनाओं की फाइलों में नहीं, ज़मीन पर दिखनी चाहिए।

वर्ना यह क्षेत्र सिर्फ़ राजनीतिक भाषणों की शोभा बना रहेगा।


लोकसभा 2024: यूपी में जाति-धर्म का समीकरण और वोटों की नई गोलबंदी"

 


उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति और धर्म का प्रभाव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 ने इसे एक बार फिर सबसे बड़े निर्णायक कारकों में साबित कर दिया। इस चुनाव में मतदाताओं की पसंद न केवल विकास के मुद्दों से बल्कि उनकी सामाजिक पहचान और सामूहिक अस्मिता से भी तय हुई।


इस बार भाजपा को चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन ने विपक्ष को एक नया रूप दिया। इस गठबंधन को विशेष रूप से मुस्लिम, यादव, और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों (जैसे मौर्य, शाक्य) से अपेक्षित समर्थन मिला। वहीं, भाजपा ने अपने मजबूत सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी, और दलित मतदाता आधार को बनाए रखा, जिससे मुकाबला कांटे का रहा।


🔹 मुस्लिम मतदाता: रणनीतिक गोलबंदी


मुस्लिम समुदाय ने इस बार लगभग एकजुट होकर INDIA गठबंधन (सपा-कांग्रेस) को वोट किया। विशेषकर उन सीटों पर जहाँ भाजपा को हराने की संभावना दिखी, वहाँ रणनीतिक रूप से वोट ट्रांसफर हुए। यह एक स्पष्ट संदेश था कि अल्पसंख्यक समुदाय अब तुष्टिकरण नहीं, बल्कि सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग पर मतदान करता है।


🔹 यादव मतदाता: परंपरागत निष्ठा का निर्वाह


यादव समाज समाजवादी पार्टी की रीढ़ रहा है, और 2024 में भी यह निष्ठा कायम रही। हालांकि भाजपा ने मोदी ओबीसी ब्रांडिंग के ज़रिए यादवों के कुछ वर्गों में सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन कुल मिलाकर सपा का जनाधार बना रहा।


🔹 मौर्य और अन्य पिछड़ी जातियाँ: असमंजस और बिखराव


मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, पाल जैसे वर्गों का वोट विभाजित रहा। भाजपा ने इन समुदायों को “सशक्त प्रतिनिधित्व” और “सामाजिक सम्मान” के नारे के साथ अपने साथ जोड़े रखा, वहीं सपा ने स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं को आगे कर समर्थन जुटाने का प्रयास किया। नतीजतन, इस वर्ग का मतदाता एकतरफा किसी भी ओर नहीं गया।


🔹 दलित वोटर: बसपा की चुप्पी, वोटर की चुप्पी


मायावती की बहुजन समाज पार्टी इस चुनाव में लगभग निष्क्रिय रही। इसका लाभ भाजपा और सपा-कांग्रेस दोनों ने उठाया। जहां जाटव समुदाय अब भी बसपा के प्रति निष्ठावान दिखा, वहीं अन्य दलित वर्गों (जैसे पासी, वाल्मीकि) ने भाजपा की सामाजिक योजनाओं और हिंदुत्व आधारित सुरक्षा के संदेश को अपनाया।


🔹 धर्मनिरपेक्षता बनाम ध्रुवीकरण


उत्तर प्रदेश में धर्मनिरपेक्षता अब केवल सिद्धांत नहीं, रणनीति बन गई है। एक ओर विपक्ष अल्पसंख्यकों और पिछड़ों को एकजुट कर "संविधान बचाओ" का संदेश देता है, वहीं भाजपा "राष्ट्रवाद", "सांस्कृतिक गौरव", और "सबका साथ" की ब्रांडिंग के जरिए जनमानस को जोड़ती है। इस संघर्ष में धर्म और जाति दोनों पक्षों की रणनीति का केंद्रीय बिंदु बन गए हैं।



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🔚 निष्कर्ष:


> लोकसभा चुनाव 2024 ने साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में मतदाता अब जाति और धर्म के बीच एक नई राजनीतिक समझदारी के साथ वोट डालता है।

वोटर अब जागरूक है, लेकिन उसकी प्राथमिकताएँ अब भी सामाजिक पहचान से गहराई से जुड़ी हैं।

सवाल यह है कि क्या अगली बार यह पहचान विकास में तब्दील होगी?

बार-बार वकीलों की हड़ताल: कानून के रक्षक या न्याय में बाधा?



लेखक: आशीष कुमार जायसवाल ऐडवोकेट 

कहा जाता है कि  “न्याय में देरी से जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ जाता है।”

कोर्ट परिसर में चुप्पी पसरी हुई है। पेशी की तारीख़ पर पहुंचे सैकड़ों लोग मायूस लौटते हैं। वकील मौजूद नहीं हैं, क्योंकि वे हड़ताल पर हैं। यह दृश्य अब कोई असामान्य बात नहीं रही। आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से में वकील हड़ताल पर चले जाते हैं—कभी पुलिस से झड़प, कभी जज की टिप्पणी, तो कभी किसी सहकर्मी पर कार्रवाई।


लेकिन सवाल यह है कि जब न्याय के रक्षक ही न्याय प्रक्रिया को बाधित करें, तो आम जनता कहां जाए?



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क्या कहते हैं आँकड़े?


नेशनल जुडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार देश भर में लाखों केस वर्षों से लंबित हैं। कोर्ट की देरी को लेकर अक्सर न्यायपालिका को दोष दिया जाता है, लेकिन वकीलों की हड़तालें भी एक बड़ी वजह हैं। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक जैसे राज्यों में तो साल भर में औसतन 20–30 दिन कोर्ट वर्क बाधित होता है।



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वकीलों का पक्ष: आत्म-सम्मान का सवाल


वकीलों का मानना है कि वे कानून व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं, लेकिन उनका सम्मान और अधिकार अक्सर अनदेखा किया जाता है।


हाल ही में कई हड़तालें पुलिस द्वारा वकीलों के साथ बदसलूकी के खिलाफ की गईं।


कुछ मामलों में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा वकीलों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की गई — जिसे वकील ‘मानहानि’ मानते हैं।


बार एसोसिएशन बार-बार कहता है कि शांतिपूर्ण विरोध उनका संवैधानिक अधिकार है।




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विरोध का अधिकार, लेकिन क्या सीमा भी होनी चाहिए?


सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि वकीलों की हड़तालें अवैध हैं।


2002 में Ex-Capt. Harish Uppal बनाम भारत सरकार केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था:


> "वकीलों को हड़ताल करने या अदालत का बहिष्कार करने का कोई अधिकार नहीं है। यह न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।"




बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी कई बार अपील की है कि वकील वैकल्पिक तरीकों से विरोध जताएं—जैसे काली पट्टी, मार्च, याचिका—but कोर्ट वर्क बाधित न करें।




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किसे होता है सबसे ज़्यादा नुकसान?


इस प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान आम जनता को होता है:


जेल में बंद गरीब कैदियों को जमानत नहीं मिल पाती।


पीड़ित को वर्षों तक न्याय नहीं मिलता।


गवाह की उपस्थिति बर्बाद हो जाती है।


न्याय व्यवस्था की साख पर सवाल खड़े होते हैं।




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समाधान क्या हो सकता है?


1. संवाद को प्राथमिकता मिले — वकीलों, न्यायाधीशों और शासन के बीच नियमित संवाद हो।



2. संस्थागत शिकायत तंत्र बने — जिससे वकीलों की समस्याएँ समय रहते सुलझ सकें।



3. अनुशासनात्मक नियंत्रण — अनावश्यक हड़तालों पर सख्ती से रोक लगे।



4. संपूर्ण न्यायिक सुधार — जिसमें वकीलों के कल्याण और सम्मान की भी बात हो।





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निष्कर्ष:


कानून की डिग्री पहनकर न्याय का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील समाज के सबसे ज़िम्मेदार वर्गों में आते हैं। लेकिन अगर वे खुद न्याय की गति को रोकने लगें, तो यह संविधान की आत्मा पर प्रहार जैसा होगा।


अदालतें सिर्फ जजों से नहीं, वकीलों से भी चलती हैं। यदि वे ही मैदान छोड़ दें, तो न्यायपालिका एक अधूरी इमारत बन जाती है।